शुक्रवार, नवंबर 18

अर्धांगिनी

शालिनी गृहस्थी का सारा काम सुबह-२ निपटा कर,  हॉल में रखे सोफे पर बैठी चाय की चुस्किय ले रही थी!
९-१० बजे तक तो रोज काम ख़तम हो जाता है और फिर वो अपने पसंद के धारावाहिक का मजा लेती है दोपहर भर! विवेक तो सुबह ८ बजे ही चले जाते हैं ऑफिस!


(शालिनी और विवेक की शादी को अभी २ ही महीने हुए थे, की विवेक का ट्रान्सफर हो गया चंडीगढ़ से पुणे..
शालिनी भी इकोनोमिक्स में Ph.D. है! उसके पापा की इच्छा थी कि उनकी बेटी एक अच्छी  इकोनोमिस्ट बने!
और उनका नाम रोशन करे! किन्तु जब अच्छा लड़का और घर-परिवार मिलता नजर आया तो अपना और बेटी का सपना भुला कर उन्होंने शालिनी को इस रिश्ते के लिए मना लिया, ससुराल वालो कि इस शर्त पर कि शालिनी शादी के बाद जॉब नहीं करेगी!
और इस तरह वो भविष्य की इकोनोमिस्ट T.V.के चैनल की  टी. आर.पी. बढा रही है!)


ट्रिंग-ट्रिंग -----हॉल में टेलीविजन वाली टेबल के निचे रखे लैंड -लाइन फ़ोन की घंटी बजी!


लपक कर शालिनी ने फ़ोन उठाया की शायद विवेक का ही फ़ोन होगा!


हेल्लो...शालिनी...बेटा मैं बोल रही हु...!!!


(शालिनी की सास का फ़ोन था, अनपद थी पर सुशील और सुग्रहनी थी! और शालिनी से काफी लगाव था! एकलौती बहु जो ठहरी ! रोज खुद फ़ोन करती थी!)


सास से बात करके शालिनी की बोरियत भाग गई और फिर शालिनी ऊपर दाल साफ़ करने चली गई!
निचे आई तो देखा की विवेक का मेसेज आया है मोबाइल फ़ोन पर!


शालू! तुम रात में खाना बना के खा लेना और मेरे लिए रख देना ! मुझे देर हो जाएगी!
मिस यू !


शालिनी ने पढ़ा और फिर सोचने लगी की अभी बता दिया है यानी आज तो फ़ोन भी नहीं आएगा...अकेले जैसे-तैसे शाम होती है इंतज़ार में .आज पता नहीं समय कैसे कटेगा!


विवेक ११ बजे आया!खाना खा के सो गया! फिर तो जैसे रोज ही ११ बजे आना आम बात हो गई थी विवेक के लिए! सुबह ८-९ बजे चले जाता और ११ बजे तक घर आता! थका-हरा चुप-चाप सो जाता!


"इतनी मेहनत क्यों करते हो? खुद को भी आराम देना चाहिए" चाय बनाते हुए शालिनी ने बोला..
महीने के दुसरे शनिवार की छुटी थी! इसलिए दोनों देर से उठे थे...


"अरे यार! आजकल ऊपर की तनख्वाह भी जरुरी है...इतनी महंगाई में २५,००० से क्या होता है?
और फिर भविष्य के लिए भी तो बचना है या नहीं?"
विवेक ने चाय का प्याला शालिनी के हाथ से लेते हुए कहा!


"हम्म ......पर ये कौनसा न्याय है कि एक तो रात-दिन काम कर के अपने आपको तोड़ ले और दूसरा बोरियत दूर करने के लिए काम ढूंढे? मैं क्यों नहीं तुम्हारा हाथ बटा सकती?" शालिनी ने पास वाले सोफे पर बठकर कहा!


विवेक को शायद उसकी यह बात पसंद न आई थी!
"इस बात पर क्या बहस करनी जब मम्मी-पापा को पसंद नहीं"


शालिनी को बात ख़तम करना ही ठीक लगा!पर जैसे वो बात उसके दिमाग के किसी कोने में चिपक ही गई हो...रात भर सोचती रही और फिर फैसला लिया अपनी सास से उस बारे में बात करेगी!


उठ कर जल्दी से विवेक का नाश्ता बनाया और उसकी गाड़ी भी साफ़ करदी...फिर चाय बना कर उसे उठाया!
विवेक तो हैरान ही था!
नहाने के लिए तौलिया उठाते हुए पूछ ही बैठा---शालू, रात भर ही काम कर रही थी क्या?
"नहीं, दिन में सो ली थी तो आँख जल्दी खुल गई" शालिनी ने मुस्कुरा कर कहा!


विवेक के जाते ही अपनी सास को फ़ोन लगाया !


" माँ, कैसे हो?"---शालिनी
" क्या बात है, आज इतनी सुबह ही काम हो गया सारा?"
"नहीं माँ, बस आपसे कुछ बात करनी है, आप बुरा न मानना !
मुझे परिवार के रिवाजो का भी ध्यान है और आपके और पापा के फैसले का भी सम्मान करती हूँ,  पर माँ विवेक का साथ देना भी तो मेरा ही फर्ज है! विवेक को रात दिन पिसते नहीं देखा जाता!
आप तो जानती है कि वो कितना देर--२ तक काम करते हैं! ऐसे में मैं कैसे घर पे चैन से बैठू?
आपकी राय जाननी थी किया करना चाहिए?"


शालिनी ने उन्हें और उनके बड़प्पन को बिना ठेस पहुचाये प्यार से अपने  मन की  व्यथा को समझाया!!
और माँ का मन बेटे-बहु की परिस्थिति समझ गया!


" बेटी, औरत का पहला काम -घर को संभालना है! बाहर के  काम के चक्कर में कई बार घर पर झगडे होते हैं! यही नहीं चाहती थी मैं, इसलिए मना किया था! अगर तुझे लगता है की तू घर सँभालने के साथ बाहर का काम अच्छे से कर पायेगी, जिससे तेरी गृहस्थी पर कोई असर नहीं पड़ेगा...तो तू जॉब कर कर सकती है!
इससे विवेक की मदद भी हो पाएगी."""
"माँ, मुझे पता था आप समझोगी, मैं वादा करती हूँ, की मेरे बाहर के काम से घर के माहौल में कोई फर्क नहीं आएगा, मैं पहले की तरह सब अच्छे से कर लूगी...थंक यू माँ.." शालिनी के पास तो मानो शब्द ही कम पड़ गए हो!
तुरंत फ़ोन किया  विवेक को!और सब बता दिया!


शाम को ६.३० बजे बेल बजी! शालिनी ने जैसे ही दरवाजा खोला विवेक को देखकर चौंक ही गई !
" आप और इतनी जल्दी कैसे?"
" मुझे तुम पर नाज है! अरे अब मुझे देर से आने का क्या जरुरत?
दोनों मिल के कमायेगे और रोज शाम की चाय भी साथ ही पियेंगे"
विवेक ने पुरे जोश में सीना तान कर कहा!


आज दोनों को साथ बालकनी में बैठे  चाय हाथ में लिए देखा तो  पडोसी भी पूछ ही बैठे!
" आज विवेक जल्दी कैसे?"


" अर्धांगिनी से मिलने का मन  हुआ और आ गया !" विवेक ने हसकर जवाब दिया!!!


------गुंजन झाझारिया











4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही मनभावन प्रस्तुति । कामना है सर्वदा सृजनरत रहें । मेरे नए पोस्ट पर आपकी आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ।

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  2. धन्यवाद प्रेमसरोवर जी आपका....
    जरुर आउंगी|

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  3. गुंज जी नमस्कार...
    आपके ब्लॉग 'कहानी की दुनिया' से लेख भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 26 जुलाई को 'अद्र्धांगिनि' शीर्षक के लेख को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
    धन्यवाद
    फीचर प्रभारी
    नीति श्रीवास्तव

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  4. वर्तमान समय की समस्या से परिचित कराती कहानी l पढ़ाने के लिए धन्यवाद l

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